Class 12th Hindi ‘Prageet aur Samaj’ Chapter Subjective Question | कक्षा 12 हिन्दी ‘प्रगीत और समाज’ चैप्टर का महत्वपूर्ण प्रशन

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Class 12th Hindi ‘Prageet aur Samaj’ Chapter Subjective Question | कक्षा 12 हिन्दी ‘प्रगीत और समाज’ चैप्टर का महत्वपूर्ण प्रशन


प्रश्न 1. आचार्य · रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। 

उत्तर- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श प्रबंधकाव्य ही थे क्योंकि, “प्रबंधकाव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है ।” सूर सागर भी ‘गीतिकाव्य’ होने के कारण उन्हें इसलिए परिसीमित लगा । लोग मुक्तकों काव्यों की निरसरता व दीर्घता से ऊबने लगे हैं। अब ऐसी लम्बी कविताएँ पढ़ने के लिए किसी को फुर्सत नहीं है । अतः रामचन्द्र शुक्ल छोटे-छोटे प्रबंधकाव्य के आदर्श को स्वीकार करते हैं ।


प्रश्न 2. ‘कला कला के लिए’ सिद्धान्त क्या है? 

उत्तर- ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत से तात्पर्य है-प्रगीत मुक्तकों का चलन अधिक होना तथा लंबी कविताओं को नकार दिया जाना । ऐसा इस कारण होता है क्योंकि मुक्तक काव्य की अपेक्षा प्रबंध काव्य की सामाजिकता अधिक समीचीन प्रतीत होती है । आचार्य शुक्ल भी इस तथ्य को अंगीकार कर चुके हैं। मुक्तक काव्य में यथार्थ परकता कुछ हटकर हो सकती है लेकिन सामाजिकता एवं संभावनाओं का पूरा एहसास प्रबंध काव्यों में प्राप्त होता है ।


प्रश्न 3. प्रगीत को आप किस रूप में परिभाषित करेंगे? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है? 

उत्तर- आमतौर पर एकांत संगीत या अकेले बैठकर गाए हुए गीत को प्रगीत माना जा सकता है। जो कविता सीधे-सीधे सामाजिक न होकर अपनी वैयक्तिकता व आत्मपरकता को अधिकता प्रदान करती है वही प्रगीत के रूप में खरी उतरती है। विद्वानों ने इसके बारे में अनेक धारणायें हमारे समक्ष उपस्थित की है। विद्वानों का विचार है कि प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त होती हैं और न ही उनसे यह अपेक्षा की जाती है । विद्वान लोग यह भी मानते हैं कि प्रगीत कविता नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक है ।


प्रश्न 4. वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अंतर है? 

उत्तर- वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविता से तात्पर्य है- किसी सामान्य विषय पर आधारित नाट्य योग्य कविता | कविताएँ भी प्रबंध के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। प्रबंध काव्य की रूपरेखा हमें वस्तुपरक कविता में ही प्राप्त होती है, क्योंकि इसमें आत्मबोध की जानकारी होती है । 

आत्मपरक प्रगीत भी, नाट्यधर्मी लंबी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। दोनों में अंतर मात्र इतना है कि वस्तुपरक यथार्थ को अंतर्जगत की । उस मात्रा में घुला देता है जितनी उस यथार्थ को ऐंद्रिय उबुद्धता के लिए आवश्यक है । इस तरह से एक प्रगीतधर्मी कविता में वस्तुगत यथार्थ अपनी चरम आत्मपरकता के रूप में ही व्यक्त होता है ।


प्रश्न 5. हिंदी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है, सोदाहरण स्पष्ट करें । 

उत्तर – हिंदी कविता के इतिहास में प्रगीत एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं । दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत मुक्तकों का ही रहा है। यही नहीं, गीतों ने जनमानस में परिवर्तन लाने में क्रांतिकारी भूमिका का निर्वाह किया है। कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि अधिकांश संतों ने प्रायः दोहे तथा गेय पदों की ही रचना की है। अगर विद्यापति को हिंदी का प्रथम कवि माना जाए तो हिंदी कविता का उदय ही गीत से हुआ, जिसका विकास आगे चलकर संतों तथा भक्तों की वाणी में हुआ। गीतों के साथ हिन्दी कविता का उदय कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक नई प्रगीतात्मकता के विस्फोट का ऐतिहासिक क्षण है ।


 प्रश्न 6. आधुनिक प्रगीत काव्य किन अर्थों में भक्ति काव्य में भिन्न एवं गुप्त जी आदि के प्रबंध काव्य से विशिष्ट है? क्या आप आलोचक से सहमत हैं? अपने विचार दें । 

उत्तर – आधुनिक प्रगीत काव्य का उन्मेष बीसवीं सदी में रोमांटिक उत्थान के साथ हुआ जिसका संबंध भारत के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष से है। यह रोमांटिक प्रगीतात्मकता भक्ति काव्य से भिन्न है तथा इसके मूल में एक नया व्यक्तिवाद है जहाँ व्यक्ति समाज के बहिष्कार के द्वारा ही अपनी सामाजिकता करता है । इन रोमांटिक प्रगीतों में भक्तिकाव्य जैसी तन्मयता तो नहीं मिलती परन्तु आत्मीयता व ऐंद्रियता की अधिकता पाई जाती है । प्रगीतात्मक काव्य के इस दौर में मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों ने भी प्रबंधात्मक काव्य ही लिखे जिन्हें उस समय ‘यादा ‘सामाजिक’ माना गया, लेकिन प्रबुद्धजनों ने शीघ्र ही इस सत्य को भाँप लिया कि असामाजिक प्रतीत होने वाले रोमांटिक प्रगीत उस युग की चेतना को कहीं अधिक गहराई के साथ वाणी प्रदान कर रहे थे तथा उनका ‘असामाजिकता’ में ही सच्ची सामाजिकता समाई हुई थी।



प्रश्न 7. “कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन सकता है।” इस कथन का आशय स्पष्ट करें। साथ ही किसी उपयुक्त उदाहरण से अपने उत्तर की पुष्टि करें। 

उत्तर – आलोचकों की दृष्टि में प्रगीत वैसा काव्य है जिसमें व्यक्ति का एकाकीपन झलके अथवा व्यक्ति समाज से कटा या समाज के विरुद्ध हो । समय के अनुसार प्रगीतात्मक कविता में कई परिवर्तन हुए। स्वयं व्यक्ति के अंदर भी अंतः संघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान आत्मविडंबना ने ले लिया है। इसी कारण आलोचक कहता है कि कविता जो कुछ कहती है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो एकाकीपन में मानवता की आवाज सुनने की क्षमता रखता है । भाव यह है कि व्यक्तिगत अथवा एकांत में लिखे गीतों में भी मानवता के भाव उपस्थित रहते थे तथा एकाकीपन के मर्म को समझने वाला व्यक्ति ही उसे समझ सकता है। यहाँ समाज के उस दबाव को महसूस किया जा सकता है जिसमें अकेला होने की विडम्बना के साथ उसका अंतर्द्वद्व भी है। उदाहरण स्वरूप निम्नलिखित पंक्तियों को देख सकते हैं- 

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, 

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी ।

इस गंभीर अनंत- नीलिमा में असंख्य जीवन – इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास ।

तब भी कहते हो – कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती । 

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे यह गागर रीति ।


प्रश्न 8. मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता क्यों है, आलोचक के इस विषय में क्या निष्कर्ष हैं?

उत्तर – आलोचक की दृष्टि में नई कविता में आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी सशक्त प्रवृत्ति विद्यमान थी जिसकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी या फिर वह प्रवृत्ति समाज निरपेक्ष थी । इसी कारण यह आवश्यक था कि इन सीमित अर्थभूमि वाली कविताओं के आधार पर निर्मित एकांगी व अपर्याप्त काव्य सिद्धांत के दायरे को तोड़ा जाए तथा एक व्यापक काव्य सिद्धांत को स्थापित करने हेतु मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश किया जाए। 

इस दिशा में पुनर्विचार की प्रेरणा सर्वप्रथम मुक्तिबोध के काव्य से ही प्राप्त हुई । मुक्तिबोध ने सिर्फ लंबी कविताएँ ही नहीं लिखीं, बल्कि अनेक छोटी कविताओं की रचना भी की है। उनकी कविताएँ छोटी होने के बावजूद किसी भी दृष्टिकोण से लंबी कविताओं से कम सार्थक नहीं हैं। वे कविताएँ रचना – विन्यास की दृष्टि से प्रगीतधर्मी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है। इसी कारण उनकी कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता का अनुभव किया गया है । किन्तु यह आत्मपरकता या भावमयता मुक्तिबोध की सीमा नहीं, बल्कि शक्ति है जो उनकी हर कविता को गति तथा ऊर्जा देती है । यह नई कविता के उन प्रगीत नायकों से पूर्णतया भिन्न है, जिसके अंतःकरण का आयतन संक्षिप्त है ।


प्रश्न 9. त्रिलोचन और नागार्जुन के प्रगीतों की विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। नामवर सिंह ने त्रिलोचन के सॉनेट ‘वही त्रिलोचन है वह’ और नागार्जुन की कविता ‘तन गई रीढ़’ का उल्लेख किया है, ये दोनों रचनाएँ ‘पाठ के आस-पास ‘ खंड में दी गई हैं, उन्हें भी पढ़ते हुए अपने विचार दें। 

उत्तर- त्रिलोचन ने कुछ चरित्र केंद्रित लंबी वर्णनात्मक कविताओं की भी रचना की है। लेकिन उन्होंने ज्यादातर सॉनेट या गीत ही लिखे हैं। जीवन जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र उनके प्रगीतों में मिलते हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। इन भास्वर चित्रों को अंततः जीवंत बनाने वाला प्रगीत नामक एक अनूठा व्यक्तित्व है। जिसका स्पष्ट चित्र ‘उस जनपद का कवि हूँ’, नामक संग्रह के आत्मपरक सॉनेटों में मिलता है। दूसरी तरफ, नागार्जुन की बहिर्मुखी आक्रामक काव्य प्रतिभा के मध्य आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण कम प्राप्त होते हैं, किन्तु वे क्षण जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार को एक झटके के साथ छिन्न-भिन्न कर देती है । नागार्जुन के काव्य संसार के प्रगीत नायक का निष्कवच फक्कड़ व्यक्तित्व इनके प्रगीतों को एक विशिष्ट रंग तो प्रदान करता ही है, उनका एक निश्चित सामाजिक अर्थ भी प्रकट करता है 

नामवर सिंह ने प्रस्तुत पाठ में त्रिलोचन के सॉनेट ‘वही त्रिलोचन है वह’ तथा नागार्जुन की कविता ‘तन गई रीढ़’ का उल्लेख किया है। ‘वही त्रिलोचन है वह’ में कवि अपनी तुलना किसी गंदे व फटे-पुराने कपड़े पहनने वाले व्यक्ति के साथ करता है जिसके हृदय में एक हलचल है। किन्तु वह धुन का पक्का है तथा विपदाओं को सहकर ही उसका जीवन सोने के समान निखर गया है । 

‘तन गई रीढ़’ कविता में नागार्जुन ने किसी का साथ मिल जाने से जीवन में आने वाले परिवर्तनों का उल्लेख किया है । उपरोक्त दोनों ही कविताएँ अपनी वैयक्तिकता में विशिष्ट तथा सामाजिकता में सामान्य हैं।


प्रश्न 10. ‘मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है’, केदारनाथ सिंह की उद्धृत कविता से इस कथन की पुष्टि करें। दिगंत ( भाग – 1 ) में प्रस्तुत ‘हिमालय’ कविता के प्रसंग में भी इस कथन पर विचार करें। 

उत्तर – ‘मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है’, केदारनाथ सिंह की उद्धृत कविता में इस कथन की पुष्टि होती है । कविता की रचना करते समय कवि बड़े ही सीमित शब्दों में एक विस्तृत भाव को व्यक्त करता है तथा साथ ही अपने-अपने व्यक्तिगत एहसास को संपूर्ण विश्व से जोड़ता नजर आता है । कवि द्वारा जो बात बहुत कम शब्दों में कही जाती है वह भी गहन अर्थ रखती है। अर्थ करने पर उसके कई स्तर खुलते जाते हैं। केदारनाथ सिंह की कविता ‘हिमालय’ इस बात की पुष्टि करती है । कविता में कवि कम शब्दों में गहरी चोट करता है । वह कम बोलने को ज्यादा अच्छा मानता है क्योंकि वह ज्यादा प्रभावशाली होता है ।


प्रश्न 11. हिंदी की आधुनिक कविता की क्या विशेषताएँ आलोचक ने बताई हैं? 

उत्तर- आलोचक को हिन्दी की आधुनिक कविता में नई प्रगीतात्मकता का उभार नजर आता है । वह देखता है आज का कवि न तो अपने भीतर झाँककर देखने में संकोच करता है और न ही बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचकिचाता है । वह अपने भीतर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूँटा गाड़ने की जिद रखता है और न ही बाहरी व्यवस्था को एक विराट पहाड़ के रूप में आँकने की हवस ही उसके अंदर समाई है। वह बाहर की छोटी-से-छोटी घटना, स्थिति, वस्तु आदि पर नजर रखता है तथा उसे अर्थ देने की कोशिश करता है। इसी प्रकार बाहरी प्रतिक्रिया के कारण मन के अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को भी पकड़कर उसे शब्दों में बाँध लेने का उत्साह भी उसके अंदर है । कवि का व्यक्तित्व एक नए स्तर पर अपने तथा समाज के बीच के रिश्तों को साधने का प्रयास का रहा है और उसकी इस प्रकिया में जो व्यक्तित्व बनता नजर आ रहा है वह निश्चय ही नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत देता है ।


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